अध्याय 446

दिन 3

वायलेट

मैं सुबह-सुबह काइलन के साथ गलियारों से गुज़र रही थी। वही रास्ता, वही ख़ामोशी—पर आज सब कुछ अलग लग रहा था।

मैं कल रात मुश्किल से सो पाई। बस करवटें बदलती रही, और सोचती रही कि क्या-क्या बिगड़ सकता है। आज मेरी बारी थी। आज सबकी बारी थी—लिआन, सोरा, डायलन, ट्रिनिटी…और नेट।

सिर्फ़...

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